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Apara Ekadashi Vrat – अपरा एकादशी व्रत

सनातन धर्म मे प्रत्येक वर्ष 24 और अधिक मास में 26 एकादशी आती है । सभी एकादशी का अपना अलग महत्व है। ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी अपरा एकादशी (Apara Ekadashi Vrat) के नाम से जानी जाती है।

प्रत्येक संवत में आने वाली यह पांचवीं एकादशी होती है।

कब है अपरा एकादशी
When is Apra Ekadashi in Hindi

ज्योतिषाचार्य पण्डित नीलमणि शास्त्री (Astrologer Pt. Neelmani Shastri) के अनुसार इस वर्ष 6 जून 2021, रविवार को अपरा एकादशी रहेगी। वैसे एकादशी का प्रवेश 5 जून को ही हो जाएगा।

उदयकालीन एकादशी मानने वाले वैष्णवों के लिए एकादशी 6 जून 2021 रविवार को जायेगी।

इस दिन पंजाब, हरियाणा प्रदेशों में भद्रकाली एकादशी के रूप में भी मनाई जाती है।

उड़ीसा प्रदेश में इस दिन ठाकुर जी को जलक्रीड़ा प्रारम्भ करवाते है, यह कार्यक्रम राजस्थान के मदन मोहन जी मंदिर (करौली), श्री राधागोविन्द देव जी (जयपुर), राधादामोदर जी (गौडिया, जयपुर) के मंदिरों में भी होते है। ठाकुर जी को ग्रीष्म ऋतु में जौ का सत्तू, गुलाब जल, खसखस का इत्र के साथ मोगरे और जलक्रीड़ा की झांकी विशेष रहती है।

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अपरा एकादशी का महत्व
Importance of Apara Ekadashi in Hindi

सभी एकादशी का अलग ही महत्व होता है, पद्मपुराण के अनुसार ज्येष्ठ मास के कृष्णपक्ष को होने वाली एकादशी आने वाले जन्मों के लिए भी पुण्य फलदायक है। पुराणों के अनुसार यह प्रेत योनि से मुक्ति दिलवाती है, और इस दिन उपवास करने से अपार धन और संपत्ति की की प्राप्ति है।

कहा जाता है कि अपरा एकादशी का व्रत व्यक्ति को सुख सम्पति ओर मोक्ष को प्राप्त करवाने वाली होती है।

इस दिन उपवास रखकर द्वादशी के प्रवेश पर उपवास को पूर्ण करना चाहिए।

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ग्रहों से बन रहे योग
Grah Yog in Hindi

कुंडली विश्लेषक और ज्योतिषाचार्य पंडित नीलमणि शास्त्री (Kundli Analyst Expert Pt. Neelmani Shastri) ने बताया कि इस दिन सूर्य वृष राशि में और चन्द्र मेष राशि में रहेंगे।

ग्रहों के संयोग से इस दिन सर्वार्थसिद्धि योग और राजयोग रहेगा।

इस दिन विवाह के शुभ मुहूर्त होने के कारण विवाहों की धूम रहेगी ।

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अपरा एकादशी की व्रत कथा
Apara Ekadashi ki Vrat Katha in Hindi

हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार एक समय महिध्वज नाम का एक राजा था। वह बहुत ही दयालु व धार्मिक प्रवृत्ति का था। चहुं ओर उसके नाम का यश व कीर्ति फैली हुई थी। समस्त प्रजा महिध्वज का गुणगान किया करते थे।

राजा का एक अनुज भ्राता वज्रध्वज भी था। जो अपने ज्येष्ठ भ्राता के यश, कीर्ति व जय जयकार के कारण महीध्वज से घृणा करने लगा। एक दिन अवसर पाकर वज्रध्वज ने महीध्वज को मार दिया और राज्य के बाहर एक पीपल के वृक्ष के नीचे उसे गाड़ दिया। समय से पहले मृत्यु हो जाने की वजह से महीध्वज की आत्मा को मुक्ति नहीं मिली और वह प्रेत बन गया तथा इसके बाद वह पीपल के वृक्ष पर ही रहने लगा।

एक दिन ऋषि मुनि पीपल के पेड़ के नीचे होकर जा रहे थे तो उन्होंने अपने तपोबल की शक्ति के कारण महिध्वज के प्रेत को देख लिया और उससे उसके प्रेत बनने का कारण जाना। प्रेत महीध्वज ने संपूर्ण कथा साधुओं को सुनाई। तब ऋषि ने स्वयं प्रेत के लिए अपरा एकादशी का व्रत किया और अपने व्रत का फल उस प्रेत को दे दिया जिस कारण से प्रेत की मुक्ति हो गई और उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई।

 

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