संगीत औषधि - राग से रोग उपचार

Treatement by Music संगीत औषधि – राग से रोग उपचार

संगीत औषधि – राग से रोग उपचार

संगीत मतलब एक अलग ही दुनिया, जहाँ स्वर, धुन, राग, वाद्य यंत्र सबका मिलन मन को प्रसन्न कर देता है। संगीत में सबकी अपनी अपनी पसंद होती है, पर पसंद सबको होता है। हमारे जीवन में संगीत की बहुत ही महत्वता है। कुछ संगीत की धुनें हो सकता है हमे चिडचिडापन की ओर ले जाएं, अधिकतम धुनें आनंद प्रदान करती हैं। संगीत की श्रेणी में गायन, वादन, नृत्य आदि शामिल होते हैं।

एक खास बात यह भी है कि संगीत के माध्यम से अनेकों रोगों का उपचार किया जा सकता है। में यह बहुत फायदा दिलाता है। हां आपने सही पढ़ा है, संगीत कई बीमारियों में औषधि का का काम करता है।

अनेकों शोधों के बाद अब तो चिकित्सा विज्ञान भी यह मानने लगा है कि रोज 15 से 30 मिनिट अपनी पसंद का संगीत आपके स्वास्थ्य को अच्छा रख सकता है और सबसे बढ़िया बात यह है कि इसके लिए आपको अलग से समय निकलने की भी जरूरत नहीं है। कोई भी काम करते करते आप आधा घंटा संगीत ऐसे ही सुन सकते हैं। कभी कभी आपको का मूड खराब होता है किंतु कुछ धुन ऐसी सुनाई पड़ती है जिससे एकदम मूड ठीक हो जाता है और आप भी का उठते है कि ये गाना सुनके आज का दिन बन गया। अगर मूड सही हो तो स्वास्थ्य स्वतः ही अच्छा हो जाता है।

राग (भारतीय शास्त्रीय संगीत) के माध्यम से रोगों (बीमारियों) को दूर करने की चिकित्सा पद्धति को राग चिकित्सा (Music Therapy) या नाद योग कहा जाता है। इसके द्वारा तनाव, मानसिक समस्याओं, और शारीरिक असंतुलन को ठीक किया जाता है।

भारतवर्ष में प्राचीन काल से शास्त्रीय संगीत का गायन वादन होता है। शास्त्रीय संगीत में अनेकों राग होते हैं, और इन रागों का श्रवण अनेकों रोगों का उपचार भी करता है। संगीत की ध्वनि तरंगों के माध्यम से रोग का उपचार किया जा सकता है।

ज्योतिष शास्त्र में जिस प्रकार हर रोग का संबंध किसी न किसी ग्रह विशेष से होता है उसी प्रकार संगीत में हर राग का संबंध किसी न किसी रोग से अवश्य होता है।

गंधर्व वेद के अनुसार रोगियों के उपचार के लिए यदि किसी व्यक्ति को किसी ग्रह विशेष से संबंधित रोग हो और उस ग्रह से संबंधित राग, सुर अथवा गीत सुनाया जाएं तो मरीज शीघ्र ही स्वस्थ हो जाता है।

सही समय का चुनाव: राग थेरेपी में रागों को सुनने और अभ्यास करने का एक निश्चित समय होता है (जैसे सुबह, दोपहर या शाम), जो शरीर के चक्रों और समय की ऊर्जा के अनुसार तय होता है।

संगीत के स्वरों का सीधा सम्बन्ध मानव शरीर के सात चक्रों से होता है। संगीत के आधारभूत सात स्वर- सा, रे, ग, म, प, ध, नि का सम्बन्ध सातों चक्रों से है। मूलाधार का सम्बन्ध ‘सा’ से, स्वाधिष्ठान का ‘रे’, मणिपुर का ‘ग‘, अनाहत का ‘म’, विशुद्ध का ‘प’, आज्ञाचक्र का ‘ध’ एवं सहस्रार का ‘नि’ से माना जाता है। स्वरों का आरोह और अवरोह इन्हीं चक्रों के क्रम में होता है। मूलाधार से सहस्रार की ओर के स्वर को अवरोह कहते हैं। सामान्यतः हृदय, कण्ठ और मूर्धन्य से नाद की उत्पत्ति होती है।

तो जानते हैं कि रोग व उनसे राहत देने वाले गीत-संगीत और रागों के बारे में-

शास्त्रीय संगीत से संबंधित राग के माध्यम से कोई भी संगीत, भजन या वाद्य यंत्र बजाकर लाभ प्राप्त किया जा सकता है। कुछ राग विशेष इस प्रकार हैं –

राग दरबारी व राग सारंग का नियमित श्रवण हृदय रोग में लाभकारी होता है। इस रोग में मध्यम सितार वादन अत्यंत लाभकारी होता है। तीव्र संगीत न सुनें यह हानिकारक हो सकता है।

यह रोग किसी भी व्यक्ति के जीवन में कभी भी हो सकता है, यह सबसे साधारण रोगों में से एक है। इस रोग के होने पर राग भैरवी व राग सोहनी सुनना लाभकारी होता है। बिस्तर पर शांतचित्त होकर मध्यम बांसुरी वादन सुनने से फायदा होता है। राग भैरवी सुनने का सही समय सुबह ब्रह्म मुहूर्त अर्थात् प्रात काल 4 बजे बाद का होता है। राग भैरवी के अभ्यास और श्रवण से शरीर में कफजन्य (सर्दी, खांसी, साइनस) समस्याओं और वात रोगों को दूर करने में बहुत प्रभावी माना जाता है।

इस रोग के होने पर राग खमाज सुनने से लाभ मिलता है। खाना खाते समय विशेषकर पानी-हवा जैसी प्राकृतिक ध्वनियों से परिपूर्ण मध्यम स्वर लहरियां सुनने से फायदा होता है।

यह रोग शारीरिक शक्तिहीनता से संबंधित है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति कुछ भी काम कर पाने में खुद को असमर्थ महसूस करता है। इस रोग के होने पर राग जय जयवंती सुनना या गाना लाभदायक होता है। उत्साह का संचार करने के लिए थोड़ा तेज संगीत सुनें।

जिन लोगों की याददाश्त कम हो या कम हो रही हो, उन्हें राग शिवरंजनी, राग सैरत सुनने से बहुत लाभ मिलता है। वीणा वादन और बांसुरी सुनने से अत्यधिक फायदा होता है।

खून की कमी या शारीरिक कमजोरी से पीड़ित होने पर व्यक्ति निस्तेज रहता है। राग पीलू रक्त की अल्पता में लाभकारी हो सकता है। मृदंग और ढोल से उत्साह का संचार होता है।

यह राग खून की अशुद्धियों को दूर करने में लाभकारी होता है।

इस रोग में राग बिहाग व राग मधुवंती सुनना लाभदायक होता है। घुंघरू और तबला सुनना मन प्रसन्न करता है।

उच्च रक्तचाप में धीमी गति और निम्न रक्तचाप में तीव्र गति का संगीत लाभकारी होता है। वीणा वादन सुनना भी अति लाभदायक होता है।

श्वांस संबंधी रोग जैसे अस्थमा आदि रोग में आस्था-भक्ति पर आधारित गीत-संगीत सुनने व गाने से लाभ होता है। राग मालकौंस व राग ललित से संबंधित गीत इस रोग में सुने जा सकते हैं। प्राकृतिक स्वर लहरियां जैसे समुद्र की लहरें या पानी की कल-कल से अत्यंत फायदा होता है।

अतः पोष्टिक आहार, आयुर्वेद, योग आदि के साथ-साथ संगीत को भी अपने जीवन में जगह दे व रोगों से मुक्त रहें।
अगले अंक में बतायेंगे कि कौनसा राग किस समय सुनना चाहिय, जिससे इन रागों का रोग निवारण में लाभ लिया जा सके।

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